आखिर कहाँ चूक गए Akhilesh Yadav ?
आखिर कहाँ चूक गए Akhilesh Yadav ?

Where Did Akhilesh Yadav Missed: जिस पल का पूरे देश को इंतिज़ार था, वो पल आ चुका है यानि की यूपी विधान सभा चुनाव (UP Elections) 2022 के परिणाम आ चुके हैं। बीजेपी (BJP) गठबंधन ने राज्य की कुल 403 सीटों में से 273 सीटों पर कब्जा किया है, जिसमें से बीजेपी ने 255 सीटें जीती हैं। इसके अलावा, अपना दल (सोनेलाल) को 12 और निषाद पार्टी को छह सीटों पर जीत हासिल हुई। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) के गठबंधन ने 125 सीटों पर जीत दर्ज करी। इसमें से समाजवादी पार्टी ने 111 सीटों पर जीत हासिल की, जबकि सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को छह, आरएलडी को आठ सीटों पर जीत मिली।  ‘

लिहाज़ा योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) 37 साल बाद यूपी के दूसरे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं, जो की लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को फिर 5 साल सत्ता से दूर रहना पड़ेगा। बेशक 2017 विधान सभा चुनाव के मुकाबले अखिलेश यादव ने तगड़ी फाइट करी और यूपी की सभी बड़ी क्षेत्र पार्टियों से गठबंधन भी किया, लेकिन फिर भी ऐसा क्या हुआ की 2017, 2019 के बाद फिर से 2022 में वो फेल हो गए।

आइए जानते हैं:

वोट शेयर भी बढ़ा और सीटें भी, फिर भी चूक गए Akhilesh Yadav:

आंकड़ों के मुताबिक, 2022 विधान सभा चुनाव (UP Elections 2022) में भाजपा (Bhartiya Janta Party) का वोट शेयर रहा लगभग 41% तो वहीं सपा के वोट शेयर में करीब 10% का उछाल हुआ हुआ और रहा 32% के करीब। अगर हम बात करें चुनाव प्रचार की, तो अखिलेश यादव ने वो सभी वाजिब मुद्दे उठाए जो की एक विपक्ष को जनता के लिए उठाने चाहिए, जैसे की बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, कानून व्ययस्था। लेकिन फिर भी जनता जनार्दन ने उनका साथ नहीं दिया। इसकी सबसे बड़ी वजह रही उनकी सुस्ती। अगर गौर करें, तो आप पाएंगे की अखिलेश यादव ने चुनाव में अपनी सक्रियता दिखाना शुरू करी जुलाई 2021 के करीब। पूरे 4 साल वो ज़मीन से नदारद रहे।

हालांकि इन 4 सालों में उनकी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सड़क से सदन तक सरकार को खूब घेरा लेकिन वो कहते हैं न की बिना सेनापति के सैनिक भी एक हद तक ही जंग लड़ पाते हैं। चाहे कोरोना काल हो या लखीमपुर और हाथरस कांड, हर जगह अखिलेश यादव ने एक ट्वीट भर ही करना मुनासिब समझा। इतर प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) ने इन मामलों मे ज़्यादा सक्रियता दिखाई। राजनीतिक एक्स्पर्ट्स के मुताबिक अगर अखिलेश कभी अपने कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर संघर्ष करने उतरे होते तो शायद इससे उनकी पार्टी को और फायेदा होता। वो इस भूल में रहे की चुनाव के 7 महीने पहले करी गई मेहनत से जीत हासिल हो जाएगी वो भी भाजपा जैसी पार्टी से जिसकी कार्यशैली पूरे 5 साल एक समान, एक गति में निरंतर चलती रहती है। चूंकि भाजपा के मुकाबले सपा के पास प्रमुख चेहरों की काफी कमी है, इसलिए अखिलेश की ज़मीनी राजनीति से गैर मौजूदगी उन्हें नुकसान पहुंचा गई।

परिवार और दलबदलू को टिकट भी रहा कारण :

भाजपा के परिवारवाद के अटैक से बचने के लिए अखिलेश ने बड़िया खेल खेला। इस बार अपने परिवार से अखिलेश ने सिर्फ शिवपाल सिंह यादव को ही चुनावी मैदान में उतारा था उसके बावजूद उन्हे ना तो चुनावी प्रचार और ना ही रणनीति में कुछ खास हिस्सेदारी दी। उन्होंने चाचा शिवपाल सिंह यादव की पार्टी से गठबंधन तो किया लेकिन उनके साथ इक्का दुक्का मौके के अलावा ना कहीं मंच साझा किया और ना ही प्रचार की ज़्यादा ज़िम्मेदारी उन्होंने सौंपी। ज़ाहिर है वो भाजपा को कोई मौका नहीं देना चाह रहे थे लेकिन शायद ये उनकी खुद की पार्टी के लिए भी नुकसानदायक रहा। सब कुछ वो ज्यादातर खुद और गठबंधन के सदस्यों से मिल जुलकर ही तय करते गए और शिवपाल जैसे अनुभवी राजनेता का सही इस्तेमाल नहीं कर पाए। मुलायम सिंह यादव भी स्वास्थ्य कारणों की वजह से कुछ ही जन सभाएं कर सके।

शिवपाल सिंह यादव के तजुर्बे को कम इस्तिमाल किया अखिलेश यादव ने:
Shivpal Singh Yadav के तजुर्बे को कम इस्तेमाल किया Akhilesh Yadav ने:

ऐन मौके पर दूसरे दलों से आए नेताओं को टिकट देना भी सपा और अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) को काफी भारी पड़ा। अखिलेश (Akhilesh) ने लगभग सभी दूसरे दलों से आए नेताओं को वहा से टिकट दिया, जहाँ खुद उनकी पार्टी के नेता टिकट की आस में थे। इससे हुआ यह की कुछ जगहों पर सपा नेताओं में नाराज़गी रही। अब उधारण के तौर पर भाजपा से आए स्वामी प्रसाद मौर्य को ले लीजिए, जिन्हें फ़ाज़िलनगर से टिकट दिया गया तो सपा के इलियास अंसारी ने अपने समर्थकों के साथ बसपा का दमन थाम लिया। उसका नतीजा ये रहा की फ़ाज़िलनगर की सीट भाजपा की झोली में गई और स्वामी प्रसाद मौर्य चुनाव हार गए।

Overconfidence और High Tech रथ से चुनाव में जीत मुश्किल:

अपनी रथ यात्रा में पहुँच रही भीड़ को देखक सपा मुखिया चुनाव के नतीजे आने से काफी पहले से ही आश्वस्त लग रहे थे की उनकी सरकार बनने जा रही है। कई मौकों पर उनके तेवर ऐसे थे की मानो उनका मुख्यमंत्री बनना तय है। चाहे अफसरों को लेकर उनके बयान हों या प्रेस वार्ता में पत्रकारों से तीखे व्यवहार में बात करना, कहीं न कहीं जनता ने ये देखा और शायद नतीजा सपा के खिलाफ रहा।

मथुरा में door to door प्रचार करते ग्रह मंत्री अमित शाह।
मथुरा में door to door प्रचार करते ग्रह मंत्री अमित शाह।

एक और बात। अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) अपने पूरे चुनावी प्रचार के दौरान शायद ही कहीं सड़क पर या घर घर जाकर प्रचार करने गए हों। वो सिर्फ अपने रथ से ही पूरे यूपी में घूमे। वहीँ दूसरी तरफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से लेकर ग्रह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) खुद सड़क पर उतर कर पर्चे बांटते और प्रचार करते दिखाई दिए थे। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में ज़मीनी स्तर पर प्रचार किए बिना जीतना लगभग नामुमकिन है। जब बड़े नेता आम आदमी के दरवाज़े पर आते हैं, तो वो उस नेता से कहीं न कहीं प्रभावित ज़रूर होता है भले वो किसी भी पार्टी का समर्थक क्यों न हो। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में High Tech रथ से प्रचार प्रसार करके जनता जुड़ पाना काफी मुश्किल है वो भी भाजपा के खिलाफ जिसका संगठन सबसे बड़ा है।

ना किसान आंदोलन ने लाभ दिलाया और ना मिला जाटों का साथ:

अखिलेश-जयंत की जोड़ी ने वोट तो बटोरे लेकिन उम्मीद से कम:
अखिलेश-जयंत की जोड़ी ने वोट तो बटोरे लेकिन उम्मीद से कम:

पहले चरण का चुनाव (UP Elections), जिसका काफी शोर रहा पूरे चुनाव में वहाँ पर 58 में से 46 सीटों पर भाजपा काबिज़ हुई और सपा को 5, रालोद (Rashtriya Lok Dal) को 7 सीटें मिली। पहले चरण का चुनाव जिस पश्चिमी उत्तर प्रदेश में था, उसे राजनीतिक भाषा में जाटलैंड कहते हैं और चुनाव से पहले हर तरफ बस यही शोर था की सपा रालोद गठबंधन यहाँ भाजपा का सूपड़ा साफ कर देगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। चूंकि इस क्षेत्र में किसान आंदोलन का भी सीधा असर था, तो ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे की जाट वोट इस बार भाजपा से खिसक सकते हैं लेकिन अखिलेश और जयंत की जोड़ी ऐसा करने में नाकामयाब रही। यहाँ भी अखिलेश ज़मीनी मेहनत से मार खा गए। चुनाव से पहले अगर उन्होंने किसान आंदोलन में ट्वीट करने के बजाए खुद उनके बीच जाकर उनके हक की आवाज़ उठाई होती तो शायद चुनावी माहौल उनके पक्ष में होता। हालांकि रालोद ने इस बार काफी अच्छा प्रदर्शन करते हुए 8 सीटें हासिल करीं जो की 2017 में सिर्फ 1 सीट पर सिमट गई थी।

तो ये साफ है की हार के कारण कई हैं और इसी में वर्तमान चुनाव में समाजवादी पार्टी की हर के बाद, अखिलेश यादव के नेत्रत्व पर सवाल उठ रहे हैं जो की लाज़मी है और सब इसी प्रतीक्षा में हैं, की आखिर अब उनका आगे का रोड मैप क्या होगा।


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faraz
Faraaz
Journalism Student | iamfhkhan@gmail.com | + posts

Faraaz is pursuing Mass Communication & Journalism from BBD University Lucknow.