Kakori Conspiracy
Kakori Conspiracy 96 Years Of Kakori Action

Kakori Train Action: हम सब 15 अगस्त को स्वंत्रता दिवस के रूप में बड़े धूम धाम से मनाते हैं लेकिन क्या ये आज़ादी हमें आसानी से मिल गई थी? जवाब है नहीं।

स्वतंत्रता सेनानियों ने भारत को अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी दिलाने के लिए अनेक तरह के संघर्ष किए। उनमें से एक था काकोरी कांड या काकोरी ट्रेन लूट। आज यानी 9 अगस्त 2022 को काकोरी ट्रेन लूट की 97वीं वर्षगांठ है। आज ही के दिन 9 अगस्त सन् 1925 को स्वतंत्रता सेनानियों ने सहारनपुर से लखनऊ के लिए रवाना हुई ट्रेन को काकोरी (Kakori) में लूटा जिसमे फिरंगी सरकार का खज़ाना रखा हुआ था जिसकी कीमत 8 हजार रूपये बताई जाती है। इस लूट को इसलिए अंजाम दिया गया था, ताकि देश की आज़ादी के लिए हो रहे आंदोलन को मज़बूती मिल सके।

काकोरी ट्रेन वाक्या: स्वतंत्रता सेनानियों का वो क़दम जिसने अंग्रेजों को अंदर से हिला दिया था
काकोरी में ट्रेन लूटते वक्त, क्रांतिकारियों द्वारा ऐसे ही चार जर्मन मॉजर नामक पिस्तौलों का उपयोग किया गया था।

Kakori Train Action: इस क्रांतिकारी लूट का आयोजन Hindustan Republic Association द्वारा राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में किया गया था जिनके मुख्य साथी थे अशफाकुल्लाह खान, राजेंद्र प्रसाद लाहिरी, चंद्रशेखर आज़ाद, सचिंद्र बक्शी, केशब चक्रवर्ती, मन्मथनाथ गुप्ता, मुरारी लाल गुप्ता, मुकुंदी लाल और बनवारी लाल। लूट के पीछे इन क्रांतिकारियों के दो मकसद थे पहला, लूटे हुए पैसों से हथियार खरीदना जिससे की अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में मज़बूती मिले और दूसरा, की देश में संदेश जाए की स्वतंत्रता आंदोलन शांत नहीं हुआ बल्कि और जोश से भर गया है।

इस लूट के दौरान मन्मथनाथ गुप्ता की बंदूक से अनजाने में एक पैसेंजर की मृत्यु भी हो गई थी। अंग्रेज़ी सरकार इस कांड के बाद बौखला उठी और एक के बाद एक ताबड़तोड़ गिरफ्तारियां हुई, जिसमे Hindustan Republican Association के लगभग 40 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया और मुकदमे चले।

क्रांतिकारियों के लीडर, राम प्रसाद बिस्मिल जी को 26 सितंबर 1925 को सहारनपुर से अरेस्ट किया गया और उसके बाद, अशफाकुल्लाह खान को 17 जुलाई 1926 को दिल्ली से गिरफ्तार किया गया। चंद्र शेखर आजाद वहां से बचके निकलने में कामयाब हो गए थे और काफी समय तक उनकी गिरफ्तारी न हो सकी।

काकोरी ट्रेन वाक्या: स्वतंत्रता सेनानियों का वो क़दम जिसने अंग्रेजों को अंदर से हिला दिया था
काकोरी ट्रेन एक्शन में शामिल हुए वाले क्रांतिकारी।

कहा जाता है आज़ाद भेष बदलने में माहिर थे, इसी कारण वो आसानी से हाथ आने वाले नहीं थे। हर तरीके से क्रांतिकारियों से आज़ाद का पता जानने की कोशिश की गई, लेकिन कोई कुछ न बोला। जब अंग्रेजों ने बिस्मिल जी से आज़ाद के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा–

इन नपुंसकों की फौज में कोई मर्द न पाया जाएगा,
वो तूफान में चलने वाला चिराग है, तेरी फूंकों से नहीं बुझाया जाएगा।
तुम क्या पकड़ोगे समुंदर को, तुम क्या पकड़ोगे आसमान को, तुम क्या पकड़ोगे हवा को,
और अगर कहीं पकड़ भी लिया तो तुम क्या पकड़ोगे आज़ाद को, क्योंकि आज़ाद ही आज़ादी है।

कोर्ट की तरफ से प्रत्येक क्रांतिकारी को वकील देने की पेशकश थी लेकिन बिस्मिल जी ने इसे ठुकरा दिया और अपना पक्ष स्वंय ही रखना चाहा। काकोरी कांड का अंतिम फैसला जुलाई 1927 को आया जिसमे 15 लोगों को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। लेकिन राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिरी को फांसी की सजा सुनाई गई और अन्य क्रांतिकारियों को काले पानी की सज़ा एवम् कुछ को 5, 10, और 15 साल की कारावास की सज़ा दी गई।

आपको बता दें की ठाकुर रोशन सिंह जो की काकोरी ट्रेन एक्शन (Kakori Train Action) में शामिल नहीं थे, उन्हें भी फांसी की सज़ा दी गई लेकिन फिर भी उनके माथे पे ज़रा भी शिकंत नहीं थी बल्कि वो हस्ते हस्ते फांसी के फंदे पे झूल गए। 17 दिसंबर 1927 को राजेंद्र लाहिरी को गोंडा जेल में फांसी दी गई, उसके बाद 19 दिसंबर को राम प्रसाद बिस्मिल (Ram Prasad Bismil) को गोरखपुर जेल, अशफाकुल्लाह खान (Ashfaqullah Khan) को फैजाबाद जेल और ठाकुर रोशन सिंह (Thakur Roshan Singh) को इलाहाबाद जेल में फांसी दी गई। राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान, ठाकुर रोशन सिंह और राजेंद्र लाहिरी की आयु क्रमशः 30, 27, 35 एवम् 24 वर्ष ही थी जब वह आज़ाद भारत का सपना लिए बिना किसी जिझक के शहीद हो गए।

काकोरी ट्रेन वाक्या: स्वतंत्रता सेनानियों का वो क़दम जिसने अंग्रेजों को अंदर से हिला दिया था
क्रांतिकारी जिन्हें फांसी देके शहीद कर दिया गया।

इन क्रांतिकारियों की फांसी और काला पानी की सज़ा के बाद देश में स्वतंत्रता संग्राम को और तेज़ी मिली और चंद्रशेखर आज़ाद ने भगत सिंह और सुखदेव के साथ मिलकर Hindustan Republican Association को और मज़बूत किया, लेकिन 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों के साथ हुई मुठभेड़ में, खुद को गोली मार कर आज़ाद भी शहीद हो गए। ये स्वतंत्रता सेनानी भले ही शहीद हो गए हों, लेकिन इन सेनानियों के पराक्रम के किस्से हमेशा जीवित रहेंगे और ये किस्से आने वाली पीढ़ियों को देशप्रेम के लिए प्रेरित करते रहेंगे।

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faraz
Faraaz
Journalism Student | iamfhkhan@gmail.com | + posts

Faraaz is pursuing Mass Communication & Journalism from BBD University Lucknow.