Palgarh Lynching: धर्म का चश्मा उतार कर अगर हम देखेंगे तो इस साधू की तस्वीर, ठीक उसी प्रकार से हमें विचलित कर सोने नहीं देती है, जैसे कि अख़लाक़, पहलू, इसंपेक्टर सुबोध और तबरेज़ अंसारी की. मगर क्या करें, हमारे दिलों में नफ़रत ने ऐसे पक्के मकाँ बन लिये हैं, जिसे मोहब्बत की जे॰सी॰बी॰ भी नहीं तोड़ पा रही है.

मीडिया रूपी वैज्ञानिकों ने जो नफ़रत के फ़ार्मूले से बरबादी की टाँनिक इजाद की है. और जिस तरह से हमारा समाज बड़े शौक़ से उसका सेवन कर रहा है. भीड़-तंत्र नामक फ़्रेंकेस्टीन उस प्रयोग का ही नतीजा है. ये फ़्रेंकेस्टीन ना आपका धर्म देखता है ना जाती और ना ही आपकी उम्र का लिहाज़ करता है. इसकी प्रोसेसिंग इस प्रकार से की गयी है की बस जब तक ज़मीन पर पड़ा ज़िंदा मुर्दा ना हो जाए, तब तक उसे पीटते रहने है.

आप चाहे जितना गिड़गिड़ाते रहिये, रोते रहिये, और अपनी जान की भीख माँगते रहिये…ये मोंस्टर कुछ भी सुनने और समझने को तैय्यार नहीं. मगर हाँ जब आपकी आत्मा इस शैतान की हैवानियत के आगे दम तोड़कर आख़िर में आपका शरीर छोड़ देती है. तब जाकर इस भीड़-तंत्र को एहसास होता है कि उसका काम हो गया है. और Palgarh Lynching उसी का एक नतीजा है.

अगर दंगे करने ही हैं तो मोहब्बत के दंगे कीजिये, नफ़रत के दंगे तो हिटलर ने भी किये थे. जिसका अंजाम ये है कि आज हर जर्मन उसको गरियाता है.

हम सदियों से गंगा-जमुनी तहज़ीब के साथ सह अस्तित्व में रहते आयें है. एक-दूसरे के अच्छे-बुरे में काम आए हैं, तो फिर हम भड़काने वाले लोगों की बातों में क्यों इतनी आसानी से आ जाते हैं. आज़मा कर देखियेगा ये भड़काने वाले भड़का के निकल जाते हैं मगर ज़रूरत पड़ने पर हमारे पड़ोसी और दोस्त ही काम आते है. वो चाहे किसी भी मज़हब से क्यों ना हों.

तो फिर आज अचानक से दिलों में इतनी नफ़रते क्यों पाल ली हमने? ज़्यादा गम्भीर विषय तो नहीं है…इसलिए सोचियेगा ज़रूर.

दिलों में एक-दूसरे के लिए नफ़रत रखने से ये नफ़रते और ज़्यादा बढ़ेंगी. इतिहास गवाह रहा है कि लड़-झगड़ कर किसी को कुछ हासिल ना हुआ है सिवाए नुक़सान के. इसलिए अपने-अपने दिलों से नफ़रतों को विदा कीजिये और मिल जुल कर रहिये. हिंदुस्तान जिस विविधता में एकता के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है…उसका गौरव और बढ़ाइये…क्योंकि नफ़रत से नफ़रत को कभी नहीं हराया जा सकता.