Manto: बिना उनवान के मंटो के नाम !

Manto: लोग मुझे सियाह क़लम कहते हैं लेकिन मैं तख्ता-ए-सियाह पर काली चॉक से नही लिखता सफेद चॉक इस्तेमाल करता हूँ की तख्ता-ए-सियाह और भी नुमाया हो जाए, यह मेरा ख़ास अंदाज़, मेरा ख़ास तर्ज़ है, जिसे फोहश-निगारी (अश्लीलता), तरक़्क़ी पसंदी और खुदा मालूम क्या-क्या कहा जाता है. लानत है सादात हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) पर! कम्बख़्त को गाली भी सलीके से नही दी जाती.

शोहरत की तरह बदनामी कमाने वाला अफ़साना निगार, जिसे सज़ा बस इस बात की दी गयी कि उसने समाज को आईना दिखाया.

सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) 11 मई 1912 को मौज़ा समराला ज़िला लुधियाना मे पैदा हुए. उनके वालिद गुलाम हसन मंटो (Ghulam Hasan Manto) एक बैरिस्टर और जज थे. उनकी वालिदा का नाम सरदार बेगम (Sardar Begum) था. 1936 में उनकी शादी सफिया दीन (Safia Deen) से हुई. मंटो (Manto) और सफिया की तीन बेटियाँ निघत (Nighat), नुज़्हत (Nuzhat) और नुसरत (Nusrat) मंटो हैं.

Saadat Hasan Manto with his wife Safia Manto.

मंटो (Manto) ने अपने करियर का आगाज़ विक्टर ह्यूगो (Victor Hugo) के नॉवेल सरगुज़श्तेअसीर (Sarguzasht-e-Aseer A Prisoner’s Story) के उर्दू तजुर्मे से किया.

उसके बाद सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) ने लुधियाना से पब्लिश होने वाले दैनिक मसवात (Masawat) मे काम करना शुरू किया. 1941 में उन्हने ऑल इंडिया रेडियो (All India Radio) की उर्दू सरविसेज़ (Urdu Services) में काम किया. जुलाइ 1942 मे उन्होने ऑल इंडिया रेडियो छोड़ दिया और बाम्बे जाकर फिल्म इंडस्ट्री में बतौर लेखक अपने हुनर का लोहा मनवाया. उन्होने जिन फिल्मों की स्क्रिप्ट लिखी उनमे आठ दिन, चल-चल रे नौजवान, शिकारी, और मिर्ज़ा ग़ालिब शामिल हैं.

मंटो नामा

मंटो (Manto) ने अपनी 42 साल की उम्र में बहुत सी कहानियाँ, रेडियो ड्रामा, और एस्से लिखे हैं. कहानियों में अश्लीलता के आरोप की वजह से मंटो को छह बार अदालत के चक्कर लगाने पड़े थे. पांच कहानियों धुंआ (Dhuan), बू (Boo), ठंडा गोश्त (Thanda Gosht), काली सलवार (Kali Salwar) और ऊपर, नीचे और दरमियां (Upar Neeche aur Darmiyan) जैसी कहानियों की वजह से उनपर अश्लीलता फैलाने का आरोप लगाकर मुकदमा चलाया गया.

उनका कहना था, चक्की पीसनेवाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मेनान से सो जाती है, वो मेरे अफ़सानो की हिरोइन नही हो सकती मेरी हिरोइन चकले की एक टकयाई तवायफ़ हो सकती है. जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है की बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आया है.

उसके भारी-भारी पपोटे जिन पर बरसों की उड़ी हुई नींदें मुंजमिद (जमा) हो गयी है, मेरे अफ़साने का मौज़ू बन सकते है उसकी घलाज़ात, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ, यह सब मुझे भाती हैं, और मैं उनके मुताल्लिक़ लिखता हूँ. और घरेलू औरतों के सुश्ता-कलमियाँ, उनकी सेहत, उनकी नफ़ासत-पसंदी को नज़रअंदाज़ कर जाता हूँ.

Saadat Hasan Manto Writing Story.

इनमें से चार मुकदमें ब्रिटिश हुकूमत के दौरान हुए तो एक मुकदमा देश के बंटवारे के बाद पाकिस्तान में हुआ.

मगर किसी भी मामले में मंटो को सज़ा नहीं हुई. सिर्फ एक मामले में पाकिस्तान की अदालत ने उन पर जुर्माना लगाया था वो भी मात्र ₹25 का क्योंकि सुनवायी के दिन 25 तारीख़ थी.

सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) अपने अफ़सानो को एक आईना समझते थे, जिसमे लोग अपने आप को देख सके और वो कहा करते थे क़ि अगर किसी बुरी सूरत वाले को आईने से ही शिकायत हो जाए तो उसमे मेरा क्या कुसूर.

“मुझमें जो बुराइयां हैं दरअसल वो इस ज़माने की बुराइयां हैं. मेरे लिखने में कोई कमी नहीं. जिस कमी को मेरी कमी बताया जाता है वह मौजूदा व्यवस्था की कमी है. मैं हंगामापसंद नहीं हूं. मैं उस सभ्यता, समाज और संस्कृति की चोली क्या उतारुंगा जो है ही नंगी. मैं उसे कपड़े पहनाने की भी कोशिश नही करता.”

जनवरी 1948 में मंटो पाकिस्तान चले गये. सन 2018 में BBC ने दुनिया बदल देने वाली 100 कहानियों में मंटो (Saadat Hasan Manto) की ‘टोबा टेक सिंह’ (Toba Tek Singh) को भी शामिल किया.

Still of India Pakistan Separation

द प्राइस ऑफ़ फ़्रीडम (The Price of Freedom by Saadat Hasan Manto) में, मंटो उन महिलाओं के बारे में बात करते है, जिन्होंने जलियाँवाला बाग हत्याकांड के बाद अंग्रेज़ों के खिलाफ क्रांति में हिस्सा लिया था.

मंटो हमेशा से ही मजहबी कट्टरता के खिलाफ थे उनके लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत थी.

मंटो ने लिखा, मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए. सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी ट्रेजेडी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए. सबसे बड़ी ट्रेजेडी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए.

हज़ार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म ख़त्म हो गया लेकिन ये अभी भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा. उसी तरह हज़ार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम ख़त्म हो चुका. लेकिन सच्चाई आपके सामने है. सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है.

Grave of Saadat Hasan Manto dead

मंटो ज़िंदाबाद

बंटवारे का दर्द हमेशा सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) को सताता रहा. 1948 में पाकिस्तान (Pakistan) जाने के बाद वो वहां सिर्फ सात साल ही जी सके. 18 जनवरी 1955 को जिगर (Liver) की बीमारी से उनका इंतेकाल हो गया.

सआदत हसन भले ही दफ़न हो गये मगर ज़माने मे आज भी मंटो ज़िंदाबाद हैं. समाज को आइना दिखाने वाले मंटो ख़ुद कहा करते थे-

जब तक इंसानों में और ख़ास तौर पर सआदत हसन मंटो (Saadat Hasan Manto) में कमज़ोरियाँ मौजूद हैं, वो खुर्दबीन से देख-देख कर बाहर निकालता और दूसरों को दिखाता रहेगा.

“ज़माने के जिस दौर से हम गुज़र रहे हैं, अगर आप उससे वाकिफ़ नहीं हैं तो मेरे अफसाने पढ़िये और अगर आप इन अफसानों को बरदाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि ज़माना नाक़ाबिले-बरदाश्त है”.

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